Thursday, September 27, 2018

फिर जेल पहुंचे डॉ. कफ़ील की अब तक की पूरी कहानी

डॉक्टर कफ़ील अहमद को विवादों, सुर्ख़ियों और कानूनी अदावतों से छुट्टी नहीं मिल रही है. ये वही डॉक्टर कफ़ील हैं जो गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के बाद बर्ख़ास्त कर दिए गए थे. जेल गए, फिर ज़मानत पर बाहर आए और अब फिर जेल में हैं.
बीते 23 सितंबर को डॉक्टर कफ़ील के ख़िलाफ़ बहराइच ज़िला अस्पताल के चीफ़ मेडिकल अफ़सर की तहरीर पर पुलिस ने सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था और हिरासत में ले लिया था.
डॉक्टर कफ़ील पर इल्ज़ाम था कि वह बग़ैर इजाज़त बहराइच ज़िला अस्पताल के बच्चों के वॉर्ड में पहुँचकर बच्चों की जांच करने लगे और चिकित्सा संबंधी सलाह देने लगे. जब उन्हें रोका गया तो उन्होंने हंगामा किया.
लेकिन डॉक्टर कफ़ील के मुताबिक़, वह वहां इसलिए गए थे क्योंकि वहां पिछले दो महीनों में 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई है और ये इंसेफेलाइटिस का क़हर भी हो सकता है. इसी बाबत आगाह करने के लिए वह वहां गए थे ताकि मासूमों की मौत रोकी जा सके.
बहरहाल, हिरासत में गोरखपुर भेजे जाने के ठीक अगले दिन रविवार को गोरखपुर की कैंट थाने की पुलिस ने एक पुराने मामले में डॉक्टर कफ़ील और उनके भाई अदील अहमद खां को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया.
आरोप है कि अदील ने 2009 में एक फ़र्ज़ी ड्राइविंग लाइसेंस का इस्तेमाल करते हुए यूनियन बैंक में एक दूसरे व्यक्ति फ़ैज़ान के नाम से एक खाता खुलवाया था.
खाता खोलने में फ़ोटो एक तीसरे व्यक्ति मुज़फ़्फ़र आलम की लगाई गई थी जिसने पहले 2014 में बैंक को और इस साल मई महीने में पुलिस को शिकायत की थी. शिकायत थी कि उसकी फ़ोटो का ग़लत इस्तेमाल करते हुए फ़र्ज़ी खाता खुलवाकर दो करोड़ का ट्रांजैक्शन किया गया. आरोप ये भी है कि इस खाते से डॉक्टर कफ़ील को लगभग चार लाख रुपए ट्रांसफ़र किए गए थे.
अब ख़बर यह भी है कि पुलिस ने डॉक्टर कफ़ील और उसके बड़े भाई अदील के ख़िलाफ़ कुछ और पुराने मामलों को भी खंगालना शुरू कर दिया है और इनकी मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं.
इसमें बलात्कार का एक पुराना मामला भी है. कफ़ील और उनका परिवार इसे 'सच की लडाई लड़ने की सज़ा' बता रहा है.
यह वही डॉक्टर कफ़ील हैं जिन्हें पिछले साल 10 अगस्त को गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मासूमों की ज़िंदगी बचाने के लिए ऑक्सीजन के प्रबंध के लिए की गई उनकी भागदौड़ और कोशिशों के आधार पर मीडिया ने हीरो बताया था.
लेकिन कुछ ही समय बाद एक जांच रिपोर्ट के आधार पर वह आठ अन्य लोगों सहित सलाखों के पीछे पहुंचा दिये गए.
आठ महीने तक जेल में बंद कफ़ील का परिवार उन्हें बेगुनाह बताकर कोर्ट से लेकर दिल्ली तक चक्कर लगाता रहा. उसी दौरान डॉक्टर कफ़ील का जेल में लिखा गया 10 पन्ने का पत्र सुर्ख़ियों में रहा जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रशासनिक अफ़सरों को कठघरे में खड़ा किया गया था.
तब उनके समर्थन में सोशल मीडिया के अलावा जमात-ए-इस्लाम से लेकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का छात्र संघ प्रदर्शन करता नज़र आया था. गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में भी मुस्लिम बहुल इलाकों में सपा और निषाद पार्टी ने डॉक्टर कफ़ील को हीरो के तौर पर पेश कर प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ जमकर हमला बोला था.स वक़्त भी डॉक्टर कफ़ील पर कई आरोप लगाए गए थे. सोशल मीडिया में एक पोस्ट आई जिसमें यह बताया गया था कि 2009 में दिल्ली में नेशनल बोर्ड एग्ज़ाम फ़ॉर मेडिकल रजिस्ट्रेशन में वह किसी दूसरे की जगह पर परीक्षा देते हुए पकड़े गए थे और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई भी हुई थी. एक आरोप यह भी था कि 2013 में सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्हें एक मामले में सस्पेंड भी किया गया था.
उसी दौरान उनके ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला भी उछला. दरअसल, 2015 में एक महिला ने डॉक्टर कफ़ील और उनके भाई काशिफ़ पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज कराया था. बाद में पता चला कि वह महिला एक ऐसे शख़्स की नौकरानी है जिनकी डॉक्टर कफ़ील के परिवार के साथ क़ानूनी लड़ाई चलती है और यह मुक़दमा भी इसी के चलते लिखवाया गया था.
दरअसल, जिस वक़्त गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ऑक्सीजन त्रासदी के मामले में डॉक्टर कफ़ील गिरफ़्तार हुए थे, उस समय मीडिया में ढेरों ऐसी रिपोर्टें आई थीं कि जिनमें उन्हें बच्चों की जान बचाने के लिए इधर-उधर से ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतज़ाम करने वाला मसीहा बताया गया था. शायद इसीलिए तभी से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सुर्ख़ियां मिलती रहीं.
समय-समय पर पत्रकार बरखा दत्त, छात्र नेता शहला रशीद, उमर ख़ालिद जैसे लोग उनके पक्ष में ट्वीट करते रहे. इतना ही नहीं, इस साल जून में जब उनके भाई काशिफ़ पर हमला हुआ था तब अखिलेश यादव और मायावती जैसे नेताओं ने भी ट्वीट या बयान देकर इसकी निंदा की थी और योगी सरकार पर हमला बोला था.
बहुत सारे लोगों का मानना है कि डॉक्टर कफ़ील को सुर्खियां हासिल करने का जुनून है और वह इसका कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. इस साल 25 अप्रैल को जब हाई कोर्ट ने उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था, उससे पहले भी वह जेल के हालात और ख़ुद को फंसाए जाने के बारे में लगातार लिख रहे थे और उनके समर्थक '#सपोर्ट फॉर डॉक्टर कफ़ील' जैसे सोशल मीडिया कैंपेन चला रहे थे.
रिहा होने के बाद भी उन्होंने लगातार सुर्खियां हासिल करने की कोशिश की. 11 मई को वह कर्नाटक में जिग्नेश मेवाणी के साथ 'कर्नाटक फ़ोरम टू सेव द कॉन्स्टीट्यूशन' के मंच पर जा पहुंचे जहां कर्नाटक चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त हमले किए जा रहे थे.
22 मई को उन्होंने केरल में निपाह वायरस के ख़िलाफ़ जंग में ख़ुद की सेवाएं देने के लिए केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन से फ़ेसबुक पर अपील की जिसे विजयन ने स्वीकार भी कर लिया.
गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के एक वरिष्ठ चिकित्सक इसे मीडिया का ध्यान हासिल करने की कवायद बताते हुए कहते हैं कि डॉ कफ़ील के पास चिकित्सा की दक्षता से ज़्यादा सुर्ख़ियां हासिल करने की भूख रहती है और इसलिए वह पहले केरल और अब बहराइच जा पहुंचे.
इसी साल 11 जून को जब उनके भाई काशिफ़ पर गोरखपुर में हमला हुआ तब डॉक्टर कफ़ील और उनके भाई ने भाजपा सांसद कमलेश पासवान और पुलिस के कुछ अफ़सरों पर इल्ज़ाम लगाया. देशभर में इसे भी योगी सरकार के उत्पीड़न के तौर पर प्रचारित किया गया.
हालांकि, पुलिस तफ़्तीश में यह ज़मीन और प्रॉपर्टी के विवाद का पुराना मामला बताया गया जिसमें एक शख़्स नौशाद की कफ़ील के परिवार से पुरानी क़ानूनी अदावत सामने आई थी.
हर मामले को सीधे सरकार से जोड़ देने की उनकी आदत अब धीरे-धीरे उन्हें विवादित भी बना रही है.
पिछले दिनों एक महिला पत्रकार काविश अज़ीज़ लेनिन ने एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखकर '#डोंट सपोर्ट डॉक्टर कफ़ील ख़ान' नाम से एक कैंपेन शुरू किया है.
काविश का आरोप है कि डॉक्टर कफ़ील से मिलने के बाद उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वह हर मामले में ख़ुद को मुसलमान होने के चलते पीड़ित बताते हैं और सरकार विरोधी राजनीति में अपनी जगह तलाशने की कोशिश कर रहे हैं.

Monday, September 17, 2018

前联合国气候官员:只有去碳化才能保持竞争力

一年前,美国总统特朗普( )宣布将带领美国退出《巴黎气候协定》。而一年后的今天,全球应对气候变化的势头依旧强劲,联合国气候变化框架公约( )前秘书长克里斯蒂娜·菲格雷斯说道。

她告诉中外对话:“坦率地讲,从经济角度来说,我认为美国退出《巴黎气候协定》不会产生非常大的影响。因为无论从技术还是从财政的角度来看,去碳化已成定局。虽然进展可能不会太快,但的确已经是不可改变的了。这是一条不可逆转、势不可挡的路。”

近年来,中国已经越来越意识到采取强有力的气候行动所带来的好处。中国的国内政策,以及与其他国家建立的伙伴关系都清楚地表明了这一点。

菲格雷斯表示:“中美关系对达成《巴黎气候协定》至关重要。而如今协定已经成功缔结,我认为美中关系对中国来说在这一层面上的意义可能没那么大了。中国将从本国利益出发,继续坚持走自己的环保道路。”

她表示,中国主要看重的是在公众健康效益和经济竞争力方面带来的好处。

菲格雷斯指出:“中国的空气污染‘举世闻名’。但民间的行动和由此引发的一场大气污染治理行运动显示出该议题在中国得到的重视。而更重要的是,政府也开始正视这个问题,并逐步关停城市中的燃煤电厂。”

“中国领导人已经明确表示,要带领世界朝着‘生态文明’的方向前进。要想实现这个目标,就必须实现经济和金融结构的绿色转型。”

“中国想成为全球太阳能技术的领导者,不仅是国内安装量第一,在产品和技术出口方面也要拔得头筹。电池产业也是如此。目前,中国已经投资了5到7家超大型电池厂,因为中国意识到这将是一个规模巨大的市场。” 菲格雷斯说道。

但是,中国想要在未来几十年限制和削减排放仍然是一个前所未有的挑战。一份研究显示,由于经济增长强劲,预计今年中国的排放量将出现增长。

由于特朗普政府采取气候变化行动前景渺茫,菲格雷斯将希望寄托在了企业、城市和州层面的非国家行为主体上。

菲格雷斯表示:“如今人们将大量的注意力都转移到了城市、省和州上,原因有几个。首先,全球气候变化行动国家层面上所需要做的工作基本上已经包括在《巴黎气候协定》中。”

“这是一个只有国家政府之间通过谈判才能达成的法律框架,地方政府不能。如今,已经进入到了落实和深入探讨阶段,这就需要各级政府、公共部门和私有企业的密切参与。

“所以,这是政策贯彻到地方的一个自然而然的过程,日常决策是在地方政府层面上作出的。毫无疑问,这才是现在对话的重点,也就是我们支持9月召开的全球气候行动峰会( )的主要原因。”

“为了让各国政府获得必要的信心,能够在明年重回联合国谈判桌,也为了能够提高他们的承诺(也就是《巴黎气候协定》对这些国家的要求);他们必须每隔4年就进行一次谈判,而下一次谈判是在2020年。在明年进行《巴黎气候协定》工作回顾之前,他们需要最终确定兑现自己承诺的具体程序。”


巴黎档案 531日发布。这是一部国际领导人及社会变革者就《巴黎气候协定》(  落实情况及这一过程中经验教训的观点集合。